पूर्व मंत्री के निवेदन पर गौर करेंगे मुख्यमंत्री?

नवप्रदेश संवाददाता
बिलासपुर। प्रदेश में कांगे्रस की सरकार बनने के 6 माह बाद लगने लगा है कि विकासोन्मुखी कार्यों की दिशा में पहल शुरु हो गई है। बिलासपुर की बात करें तो जल संवर्धन के लिए अरपा नदी को बचाने, अरपा साडा को भंग करने, बीडीए गठन की प्रक्रिया शुरु हो गई है। शहर विधायक शैलेष पाण्डेय भी जनसमस्याओं के निराकरण के लिए न केवल वार्डों में जा रहे हैं बल्कि मुखर होकर प्रशासन के अमले को निर्देशित करना शुरु कर दिए हैं। अरपा नदी को टेम्स नदी की तरह बनाने और उसमे बारह मास पानी रहने का सब्जबाग दिखा 8 वर्षों में एक ईंट भी नहीं रखवा पाने वाले पूर्व मंत्री द्वारा अरपा साडा को भंग किए जाने के खिलाफ मुख्यमंत्री को पत्र लिखे जाने के बाद तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं भी शुरु हो गई है। वहीं पूर्व मंत्री के आक्षेप पर शहर विधायक द्वारा जवाबी हमला करने से राजनीति तेज हो गई है।
अरपा साडा की चर्चा काफी जोर शोर से होने की मुख्य वजह इस गर्मी में बिलासपुर शहर के तमाम वार्डों में पहली बार भारी पेयजल संकट होना है। पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल का ड्रीम प्रोजेक्टों में अरपा नदी भी एक था, मगर कागजों में 5 करोड़ खर्च हो गए और अरपा नदी को बचाने एक ईंट भी नहीं रखी जा सकी जिसके लिए पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल की आलोचनाएं भी हो रही है और उन पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
प्रदेश सरकार द्वारा सफेद हाथी बन चुके अरपा साडा को भंग करने और बीडीए का पुन: गठन किए जाने के राज्य सरकार के निर्णयों की चर्चा पर पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल अपने आपको नहीं रोक पाए और आनन-फानन में मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर अपनी व्यथा को व्यक्त भी कर दिया।
अरपा साडा को निर्धारित करने के निर्णय के पूर्व कुछ बातों पर ध्यान देने का निवेदन करते हुए अमर अग्रवाल ने कहा बिना राजनैतिक विद्वेष के लोकहित में निर्णय लेंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में कहा कि बिलासपुर का नागरिक और बीस वर्षों तक इसका प्रतिनिधित्व करने के नाते आपको इस परियोजना और इसके उद्देश्यों का बोध कराना मैं अपना कर्तव्य मानता हूं। यह परियोजना अपने क्रियान्वयन प्रारंभ होने के अंतिम चरण में है। आप सहमत होंगे की बिलासपुर का भविष्य अरपा पर निर्भर करता है। इसीलिए इस परियोजना का मूल उद्देश्य अरपा नदी को संरक्षित कर इसमें मिश्रित हो रहे नाले-नालियों के पानी को नदी के तट के समानांतर चौनल के माध्यम से पृथक से उपचारित करना है। इस परियोजना की प्लानिंग में सड़कों का एक ऐसा नेटवर्क प्रस्तावित है, जिससे आने वाले वर्षों में ट्रैफिक से संबंधित समस्याओं का स्थाई समाधान हो सकेगा। अरपा-भैसाझार परियोजना में भी अरपा नदी हेतु 24 प्रतिशत तक जल आरक्षण करने का प्रावधान किया गया है, जिससे अरपा में 12 महीने जल रहे। इसके साथ ही बिलासपुर के योजनाबद्ध विकास हेतु इस परियोजना से संबंधित मास्टर प्लान का प्रकाशन भी पूर्ण हो चुका है। इस मास्टर प्लान को सूक्ष्म अध्ययन एवं विस्तृत सर्वे उपरांत बनाया गया है एवं इसमें भविष्य के बिलासपुर की झलक आप देख सकेंगे। इस परियोजना में रिवर बेड संरक्षण, एम्बैक्मेंट, घाट निर्माण, बैराज, अनिकट, सिटी पार्क, संग्रहालय, 90 फुट सड़कों आदि समस्त ऐसे बिंदुओं का समावेश किया गया है जो बिलासपुर के विकास में मील का पत्थर साबित होंगे।
आपके निर्देश पर अरपा क्षेत्र में भूमि बिक्री हेतु अनापत्ति लेने का प्रावधान समाप्त करने का निर्णय लिया गया, परंतु दुख का विषय है कि इस निर्णय को लेने के पूर्व जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा आपको इस प्रावधान एव इसके अंतर्गत प्रदत्त अनापत्तियों की संख्या नहीं बताई गई। अनापत्ति लेने का प्रावधान केवल और केवल लोकहित में छोटे भूमि स्वामियों के हितों के संरक्षण के लिए अरपा के किनारे अवैध अथवा अनियमित विकास रोकने एवं शहर के विकास को मास्टर प्लान की दिशा में परिवर्तित करने हेतु रखा गया था। यदि आप प्राधिकरण से जानकारी लेते तो आपको ज्ञात होता कि अनापत्ति प्राप्त करने की प्रक्रिया सरल थी एवं ऐसे अनापत्ति की संख्या वर्ष में 100 भी नहीं होती थी।
मैं मानता हूं कि इस 18 सौ करोड़ रुपए की वृहद परियोजना की परिकल्पना एवं उससे जुड़ी समस्त तकनीकी पर्यावरणीय एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण यह प्रतीत हो रहा हो कि प्राधिकरण गठन उपरांत इसमें अपेक्षाकृत प्रगति नहीं आई है परंतु आप जैसे अनुभवी व्यक्ति के लिए यह समझना मुश्किल नहीं है कि लगभग दो हजार हेक्टेयर की इस परियोजना उससे जुड़े समस्त खसरा नंबर का सर्वे, अरपा नदी के सौ साल का फ्लड लेवल, प्लानिंग, डिजाइन आदि में थोड़ा वक्त लगना स्वाभाविक है। इस परियोजना में शासकीय कोष में राशि की एकमुश्त उपलब्धता के अभाव में इस पूरी परियोजना को पीपीपी मोड पर करने का निर्णय लिया गया था, जिससे न केवल शासकीय धन की बचत होती बल्कि लैंड पूलिंग के माध्मय से बिलासपुर के विकास हेतु वैश्विक स्तर की अधोसंरचना निजी भागीदारी से विकसित हो पाती। आपकी जानकारी के लिए इस परियोजना को मुख्य सचिव के अध्यक्षता वाली पीपीपी कमेटी ने भी पास कर दिया है। इसमें निजी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए यदि चाहें तो आप वित्त मंत्री होने के नाते शासकीय गारंटी का प्रावधान रख सकते हैं। कुछ लोगों द्वारा यह भ्रांति भी फैलाई गई कि इस परियोजना के आने से झुग्गी झोपडिय़ों टूटेगी, लोग बेघर होंगे। मैं आपके माध्यम से ऐसे लोगों से निवेदन करुंगा कि एक बार बिलासपुर के नूतन चौक स्थित प्रधानमंत्री आवास योजना के हितग्राहियों मिलें और पूछें कि कैसे उन्हें झुग्गी झोपड़ी के नारकीय जीवन से उसी स्थान पर कैसा सुंदर आवास जो निजी क्षेत्र में 25 लाख रुपए में बिकता उपलब्ध कराया गया। मेरी मंशा केवल इतनी है कि इस परियोजना से जुड़ी समस्त प्रशासकीय प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है, पीपीआर बनकर तैयार है और यदि आप आदेश दें तो इसमें तत्काल डीपीआर बनवाने के लिए निविदा जारी कर सकते हैं जिसमें केवल एक माह का समय लगेगा तत्पश्चात इसमें सीधे कार्य आपके कार्यकाल में प्रारंभ हो सकेगा।
इधर पूर्व मंत्री द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे पत्र पर कांग्रेस पार्षद दल के प्रवक्ता शैलेन्द्र जायसवाल ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को मंत्री अमर अग्रवाल ने पत्र के माध्यम से भ्रमित करने का प्रयास किया है जैसा कि वे वर्षों से बिलासपुर की जनता के साथ करते आ रहे हैं। उन्होंने अरपा परियोजना के बारे में भ्रामक जानकारियां मुख्यमंत्री को प्रेषित की है और अपनी नाकामियों को छिपाने का प्रयास किया है। अपने 20 वर्षों के विधायक के कार्यकाल और 15 वर्षों के मंत्री के कार्यकाल में बिलासपुर शहर के साथ अन्याय किया है और अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए इस शहर के साथ और अरपा नदी जो जीवनदायिनी है के साथ सिर्फ खिलवाड़ किया है और अपने व्यवसायिक हितों को साधने के लिए ऐसी परियोजना लेकर आ गए थे जो वर्ग विशेष के लोगों को संरक्षित करने वाली थी और व्यवसायियों को बढ़ावा देने वाली थी जिसके माध्यम से भू माफियाओं का खेल शहर में शुरू हो सकता था।
अपने पत्र में उन्होंने क्रमवार जो बिंदु उद्धृत किया है उसके बारे में बिंदुवार जवाब यह है यह परियोजना अपने क्रियान्वयन के अंतिम चरण में कभी नहीं रही इस परियोजना में मात्र डीपीआर बनाने का करोड़ों का खेल हुआ है और एक कंपनी के द्वारा एक ऐसा डीपीआर बनाकर दे दिया गया है जो अविश्वसनीय और असंभव था 10 वर्ष पूर्व 2700 करोड़ के इस अविश्वसनीय प्रस्ताव को अमलीजामा 9 वर्षों में नहीं पहुंचाया जा सका है जब स्मार्ट सिटी के लिए प्रस्ताव भेजे जाने थे तब इस प्रस्ताव को स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव को बना कर केंद्र शासन को भेजा था लेकिन इस बेसिर पैर के अविश्वसनीय प्रस्ताव को केंद्र शासन ने सिरे से खारिज कर दिया जिससे पहले चरण की दौड़ में बिलासपुर स्मार्ट सिटी की दौड़ से बाहर हो गया था। अरपा साडा परियोजना का उद्देश्य अरपा को संरक्षित नहीं करना था बल्कि अरपा के किनारे 2000 एकड़ की भूमि को बंधक बनाकर उसे व्यवसायिक हितों की पूर्ति करना था और बिलासपुर के भोली-भाली जनता की जमीनों को हथियाना था जिसे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने बिलासपुर के पहले प्रवास में ही बंधक जमीनों को मुक्त कर दिया था और इस परियोजना के कर्णधारों को गंभीर झटका लगा था। इस परियोजना में अरपा के संरक्षण की बारे में न्यूनतम विचार रखे गए थे और व्यवसायिक लाभ के अधिकतम पर योजनाएं लाई गई थी । इस परियोजना में सड़कों का कोई भी नेटवर्क प्रस्तावित नहीं था वास्तविकता यह है कि अपने 20 वर्ष के कार्यकाल में पूर्व मंत्री बिलासपुर में एक भी शहर एक भी नहीं सड़क का निर्माण नहीं करा सके बल्कि व्यवस्थित रूप से बनी सड़कों को सीवरेज के माध्यम से 10 वर्षों तक परेशान करने के बाद एक फेल परियोजना को इस शहर में लाद दिया गया है जिसका कोई भविष्य नहीं है। अरपा भैसाझार परियोजना बिलासपुर के लिए एक अभिशाप होने वाली है जिस बराज को पहले बिलासपुर में बनना था उसे भैसाझार में बना कर के बिलासपुर में अरपा का पानी आने से अवरुद्ध कर दिया गया और जिस 24 प्रतिशत जल की बात पूर्व मंत्री कर रहे हैं उनकी जानकारी में शायद यह नहीं है की अरपा भैसाझार परियोजना में मात्र 17 एमसीएम पानी का भंडारण ही हो सकेगा और उसका 24 प्रतिशत लगभग 4 एमसीएम होगा जबकि बिलासपुर में सालाना 35 एमसीएम पानी की आवश्यकता है इस तरह पूर्व मंत्री का यह बयान भी भ्रम और छलावे से भरा हुआ है। इस परियोजना से संबंधित मास्टर प्लान पूरी तरह से भ्रम फैलाने वाला है और बिना किसी सर्वे, ऑफिस में बैठकर बना दिया गया है इसमें टेम्स नदी , साबरमती नदी जैसे नदियों का उदाहरण देकर सब्जबाग दिखाने की कोशिश की गई है । इस परियोजना में रिवर बेड संरक्षण, घाट निर्माण, बैराज, एनीकट की जो परियोजना लाई गई है वह सिर्फ व्यावसायिक हित के लिए है और इसमें 400 एकड़ भूमि लैंड रिक्लेमेशन यानी कि अरपा को पाटकर लाया जाना था जिससे कि अरपा के घाट छोटे हो जाते और 400 एकड़ की भूमि को बिल्डरों को दे दिया जाता। पत्र पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है। अपने 20 वर्ष की नाकामियों को छुपाने और विधायक शैलेश पांडे की अरपा के प्रति गंभीरता और योजनाओं के बनाए जाने से भयभीत होकर आप अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए यह पत्र लिख रहे हैं ।आपके आगे के बिंदुओं का जवाब प्रस्तुत है
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के द्वारा जो भूमि को मुक्त किया गया है उससे पूरे शहर वासी खुश है क्योंकि इसके पूर्व में किसी भी व्यक्तियों को अरपा साडा से अनापत्ति नहीं दी जाती थी और लोगों को अपनी जमीन बेचने के लिए कोर्ट का सहारा लेना पड़ता था। इस परियोजना को 2012 में ही कंसलटेंट के द्वारा बना कर दे दिया गया था परंतु उसके बाद भी 6 वर्षों तक आपके द्वारा कोई कार्य नहीं किया गया सिर्फ बिलासपुर की जनता का भय दोहन किया गया। इस परियोजना के माध्यम से आप हजारों परिवारों को बेघर कर उनकी पुश्तैनी जमीन और उनके पुश्तैनी मकानों को अपने चहेते बिल्डरों को देना चाहते थे।
जिस अकल्पनीय परियोजना के लिए शासन के पास धन ही ना हो तो ऐसी परियोजना को बंद किया जाना ही उचित है ना कि लोगों की जमीनों को निजी हाथों में सौंप देना। यह हकीकत है कि इस परियोजना से ना केवल लोगों की झुग्गी झोपड़ी टूटती बल्कि लोगों के 5 मंजिल पक्के मकान भी टूट जाते जिससे पूरे बिलासपुर वासी अरपा के किनारे 200 मीटर तक के लोग 9 वर्षों तक भयभीत हो कर अपना जीवन यापन करते रहे हैं।
इस परियोजना की कोई भी प्रशासकीय प्रक्रिया पूर्ण नहीं हुई है और ना ही कोई डीपीआर बनाया गया है यदि ऐसा था तो इस पर योजना ली एसोसिएट्स के द्वारा 2012 में ही बना कर दे दिया गया था और उसके बाद 6 वर्षों तक पूर्व मंत्री क्यों सोए हुए पड़े थे। उन्होंने इस कार्य को प्रारम्भ क्यों नहीं करवाया।

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