धर्म और राजनीति का घालमेल

Integrating religion and politics

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योगेश मिश्र

धर्म का राजनीति से कोई रिश्ता न हो। धर्म आधारित राजनीति न हो। धर्म और राजनीति का घालमेल न हो। यह बात मंडल-कमंडल की सियासत के साथ ही तेज हुई थी। अभ्यास में आई थी। राजनीतिक दलों ने इसका लाभ उठाना शुरू किया था। इस पूरी बहस और आकांक्षा का सर्वोच्च अदालत ने चालीस दिन चली सुनवाई के बाद 1045 पेज के फैसले में अंत कर दिया।

दोनों तबकों के कुछ मु_ी भर स्वार्थी तत्वों को छोड़ दिया जाए तो हर कोई यह चाहता था-इस विवाद का अंत हो। हर किसी की ख्वाहिश थी-जो होना हो जल्दी हो जाए। हालांकि विवाद के दोनों पक्षकार भी लड़ते-लड़ते थक गए थे।
अदालत के बाहर इस विवाद को हल करने की कोशिशें भी कम नहीं हुईं। सर्वोच्च अदालत ने भी फैसले से पहले विवाद को सहमति से सुलझाने का अवसर दिया। श्री श्री रविशंकर ने अगुवाई की। इससे पहले चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में सहमति की बातचीत तीन दौर तक चली।

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विश्वनाथ प्रताप सिंह ने तो अपने प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में रामजन्मभूमि न्यास को 42 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर सौंपने का आदेश निकाल दिया था मगर दो रोज में ही उसे वापस ले लिया। नरसिम्हा राव के दौर में भी कोशिश हुई। अटल विहारी वाजपेयी ने कांचीपीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को भी लगाया। 2017 में सीजेआई जीएस खेहर ने कहा था कि अगर कोर्ट के बाहर मामला सुलझ जाए तो अच्छा है।

सहमति से रास्ता निकालने के दौरान ही बाबरी एक्शन कमेटी के सैय्यद शहाबुद्दीन और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने यह भरोसा दिलाया कि अगर यह साबित हो जाए कि पहले वहां मंदिर था तो वे अपना दावा छोड़ देंगे। इसे साबित करने के लिए दो बार खुदाई हुई। पहली खुदाई 1976-77 में हुई। दूसरी 2003 में। पुरातत्वविद् बीबी लाल की अगुवाई में हुई खुदाई के सक्रिय सदस्य केके मोहम्मद ने उसी समय कहा था कि मंदिर के 12 स्तंभों का इस्तेमाल मस्जिद के आधार स्तंभ के रूप में किया गया है।

उस समय की खुदाई में मगरमच्छ के मुंह की तरह का परनाला मिला था जो मंदिरों में चढ़ाए गए जल निकासी की व्यवस्था बताता है। 263 मूर्तियां निकली थीं। एक शिलापट्ट मिला था, जिस पर लिखा था- मंदिर उन विष्णु के लिए है जिसने बालि को मारा था, जिसने दस सिर वाले रावण को मारा था। दूसरी खुदाई में भी जो अवशेष मिले वह मंदिर साबित कर रहे थे। पुरातत्वविदों ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि विवादित स्थल के नीचे बारहवीं सदी का हिंदू मंदिर था।

अयोध्या का उल्लेख अथर्ववेद और तैतिरीय आरण्यक में है। पुराणों में अयोध्या का जिक्र है। भगवान राम के जन्म के बारे में वाल्मिकी रामायण भी बताती है। इसका समय तीन सौ से दो सौ ईसा पूर्व का है। इसके एक श्लोक में भगवान राम को विष्णु का अवतार बताया गया है। बौद्ध जातक कथाओं में भी इक्ष्वाकु वंशीय दशरथ और राम का उल्लेख है। यह सब इस्लाम के उदय के पहले के प्रमाण हैं। कालिदास की रचना रधुवंश में दशरथ पुत्र राम से जुड़ी घटनाओं का जिक्र है। 1510 में गुरुनानक देव ने राम जन्मभूमि के दर्शन किए थे।

यह भारत में बाबर के आने से काफी पहले का समय है। बाद में गुरु तेग बहादुर और उनके पुत्र गोविंद सिंह भी अयोध्या गए थे। ये सारे प्रमाण आदि साखी, पुरातन जन्म साखी, पोथी जन्म साखी, ज्ञान रत्नावली जन्म साखी, सरखंड पोथी और ज्ञानम पोथी में मिलते हैं। अयोध्या की यात्रा करने वाले ब्रिटिश यात्री विलियम फींस ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा है कि वहां विष्णु के उपासक पूजा करने आते थे।

1766 में पादरी टेलर ने भी इस स्थान पर हिंदुओं के पूजा-अर्चना का जिक्र किया है। अब्दुल फजल ने अपने आइने अकबरी में लिखा है- वहां चैत्रमास में बड़ी तादाद में हिंदू श्रद्धालु पूजा करने आते थे। मौलान अब्दुल हकीम हई नदवी ने हिंदुस्तान की उन मस्जिदों पर एक किताब लिखी है जिन्हें मंदिर तोड़ कर बनवाया गया था। अरबी भाष में लिखी गई इस किताब का उर्दू तर्जुमा भी हुआ है। इस किताब में भी अयोध्या के इस मामले का जिक्र है। मुस्लिम सत्ता ने भारत में आस्था को कुचलने की कोशिश की। दिल्ली में कुबतुल इस्लाम मस्जिद, अजमेर का ढाई दिन का झोपड़ा, धार की भोजशाला मस्जिद भी इसी के प्रमाण हैं।

इन सब प्रमाणों के बाद फैसले पर असंतोष जाहिर करना, पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात करना ठीक नहीं लगता। राम देश के श्रुति, स्मृति और धार्मिक साहित्य का अंतस हैं जो भारतीयों के जीवन और चेतना में व्याप्त हैं। गांधी के भी राम और लोहिया के भी राम। ताला खुलवाने से जोड़ें तो कांग्रेस के भी राम।

भाजपा के भी राम। जीते राम, मरते राम। आह भरें तो निकले राम। खुश हों तो पूजे राम। हम में, तुम में, खड्ग-खंभ में, घट-घट व्यापत राम। राम का होना, इसके बाद विवाद का सबब नहीं होना चाहिए। अयोध्या में राम के होने पर तो विवाद और भी नहीं होना चाहिए। मीर बाकी और बाबर के होने, उन्हें अयोध्या में बनाए रखने की लड़ाई राम से नहीं लड़ी जानी चाहिए। वह भी तब जब आस्था के सवाल को तर्क व प्रमाण प्रमाणित कर चुके हों। सर्वोच्च अदालत ने एक अवसर दिया है जिसमें न तुम जीते, न हम हारे का बोध किया जाना चाहिए।

तकरीबन कई दशकों से अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ते आ रहे हिंदू जनमानस ने भी जिस तरह फैसले का उल्लास की जगह आनंद से स्वागत किया है, उससे भी सबक लिया जाना चाहिए। विविधता में एकता वाली सांस्कृतिक विरासत को ढो रहे देश के लिए अच्छा तो यह होता कि यह फैसला हम सभी मिल बैठकर कर लिए होते। ऐसे अवसर आए भी मगर धर्म और राजनीति के गड्डमड्ड ने यह होने नहीं दिया। आज जब धर्म की राजनीति का अंत हो गया है, राजनीति को नये एजेंडे की जरूरत होगी।

इस नए एजेंडे में अब शायद वह सब आ सके जो धर्म की राजनीति में तिरोहित हो जाते थे। इसलिए अब बस। जो इसे और आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा उसे समय माफ नहीं करेगा। 2010 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अयोध्या मामले में अपना फैसला दिया था। 2019 में जब सर्वोच्च अदालत ने सुप्रीम फैसला सुना दिया है। इन दोनों कालखंडों में सभी पक्षों की खामोशी, फैसले का इस्तकबाल और पत्ता भी न खटकना यह बताता है कि लोकतंत्र को नए एजेंडों की जरूरत है। धर्म निरपेक्षता नई परिभाषा मांग रही है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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